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मनीष के आलेख नीदरलैड की वेब पत्रिका में
खेल समीक्षक एवं इंडिया स्पोर्टस के संपादकीय सलाहकार मनीष कुमार जो’ाी की टेनिस पर खेल काॅलम नीदरलैंड की वेब पत्रिका http://www.tennis-ontheline.com/ पर पढ़े जा सकते है।

क्रिकेट

संदर्भ: टी-20 विश्वकप 5 जून से
जवां क्रिकेट जवां जोश
मनीष कुमार जोशी

एक क्रिकेट विशेषज्ञ ने टेस्ट क्रिकेट को बुढ़ा क्रिकेट,एकदिवसीय क्रिकेट को अधेड़ क्रिकेट और टी -20 को जवां क्रिकेट कहा है। यह सही  भी है क्यांकि टी-20 क्रिकेट इस खेल का सबसे जवां फार्मेट में है। लेकिन महज इसलिए नहीं कि अभी इसी क्रिकेट ने अपने पांवो पर खड़ा होना सीखा है बल्कि इसलिए कि यह जवां सोच का क्रिकेट है। जवां इस मायने में की इसकी तकनीकी और सोच युवा खिलाड़ियों से मेल खाती  है। इस क्रिकेट ने  खिलाड़ियों की औसत उम्र को 30 साल से कम कर दिया है। पहली आईपीएल विजेता राजस्थान राॅयल्स और पहले टी-20 विश्वकप विजेता भारतीय टीम की औसत उम्र 30 से कम थी। यही जवां जोश एक बार फिर अपनी ताकत का अहसास करायेगा जब ईग्लैण्ड में 5 जून से दूसरे टी-20 विश्व कप का आगाज होगा।
पहली विश्व विजेता भी जवां टीम
 पहला टी-20 विश्व कप शुरू होने से पहले ही 30 पार उम्र के सितारा खिलाड़ी सचिन,सौरव, राहुल और कुंबले ने इस क्रिकेट से तौबा कर ली थी। लिहाजा पहले विश्व कप में उतरी भारतीय टीम में सभी खिलाडियों की उम्र 30 साल से कम थी। टीम में युसुफ पठान, रोहित शर्मा और जोगिन्दर जैसे बिलकुल युवा चेहरे शामिल थे। छरहरे बालो वाले जवां कप्तान महेन्द्रसिंह धोनी ने इन्ही जवां खिलाड़ियों के साथ क्रिकेट के इस नये दौर की शुरूआत की। उसने टीम में नई सोच पैदा की। लड़ने की और अंत तक लड़ने की। धोनी के लड़ाको ने इसे मूल मंत्र माना और एक के बाद एक मैच जीतते चले गये। फाईनल में अपने पंरपरागत प्रतिद्वन्द्वी पाकिस्तान के सामने अंत तक लड़ते रहे और जवां लड़ाको ने मैच की अंतिम गेंद पर मैच को प्रतिपक्षी टीम के जबड़ो में से खींच लिया। गौतम गंभीर की बल्लेबाजी और रोहित व इरफान पठान की गेंदबाजी ने भारत को जवां क्रिकेट के पहले संस्करण का विश्वविजेता बना दिया।

जवां तकनीकी का क्रिकेट
 जाने माने क्रिकेट लेखक पाॅल वेवर ने अपने एक लेख में टी-20 क्रिकेट
 को युवा खिलाड़ियेां के लिए सबसे उपयुक्त माना है। उनका मानना है कि इसकी तकनीक में जवां खिलाड़ी उपयुक्त बैठते है। इस क्रिकेट में विश्राम का वक्त नहीं है। सब कुछ निरंतर चलता रहता है और ऐसे में एक साथ ज्यादा उर्जा की जरूरत होती है जिसकी प्रचुर उपलब्धता युवाओ में ही मिल सकती है। तेज गति के अन्य खेलो यथा फुटबाल, हाॅकी और टेनिस में भी औसत उम्र 30 से कम है। ऐसे में यह खेल उनसे अलग नहीं है। क्रिकेट कोच मार्क रोबिन्सन के अनुसार इस क्रिकेट में त्वरित गति से निर्णय लेना और उसे उसी गति से कार्यान्वित करने वाले ही सफल होते है। ऐसा सिर्फ युवा ही कर सकते है। आईपीएल मे शेन वार्ने को अपने निर्णय को क्रियान्वित करने के लिए युवा खिलाड़ी उपलब्ध थे। यही उसकी काम्याबी का राज है। कहने का मतलब यह है कि यदि कोई 30 की उम्रपार खिलाड़ी अच्छा खेल भी रहा है तो उसे युवा साथी की जरूरत पड़ती है और इसे जवां सोच का क्रिकेट साबित करने के लिए यह काफी है। 

इस क्रिकेट में चंचलता है
 जवां होता मन समाज की औपचारिकताओ में बंधना नहीं चाहता है और वह अपनी नई सोच के साथ जमाने को आगे ले जाना चाहता है। टी-20 क्रिकेट औपचारिकताओ से दूर नई सोच के साथ क्रिकेट को आगे ले जाना चाहता है। इस क्रिकेट में चंचलता है। चैक्को और छक्को पर नृत्य करने वाली चीयर्स लीडर्स इसे ग्लेमरर्स बनाती है। इस नये जमाने की क्रिकेट में छक्को की दूरी नाप कर इसे और जवां बना दिया है। अपनी ताकत और तकनीक से आप गेंद को जितनी दूर भेजोगो आप उतने ही बड़े नायक होगे। ऐसे में यह कहने में कतई हर्ज नहीं होना चाहिए कि इस क्रिकेट का ताना बाना युवा खिलाड़ियां को ध्यान में रखकर बुना गया है। अब एक बल्लेबाज आउट हो जाने के बाद नया बल्लेबाज तमाम औपचारिकताओ के साथ सूदूर पवेलियन से नहीं आता है बल्कि अब पलक झपकते ही सीमा रेखा के बाहर बने छोटे से पवेलियन से कीज तक पहुंच जाता है। दर्शक दीर्घा में उपस्थिति फिल्म अभिनेत्रियां इस क्रिकेट की चमक को और बढ़ाती है। तीन घंटे के इस खेल में वो सब दिखाई दे जाता है जो एक हाॅलीवुड या बाॅलीवुड की एक फिल्में दिखाई देता है।
और अब ईग्लैण्ड में फिर जवां जंग
 इस जवां क्रिकेट की दूसरी सबसे बड़ी जंग ईग्लैण्ड में शुरू हो रही है। इस छोटे क्रिकेट के दूसरे विश्वकप में भी सभी टीमो के अधिकांश खिलाड़ियों की उम्र 30 साल से कम है। पहला विश्वकप इस बात का प्रमाण है कि वो ही टीमे फाईनल तक पहुंची जिसके खिलाड़ी उम्र से जवां थे। इस तथ्य को सभी टीमो ने स्वीकार किया है। अब हर टीम के खिलाड़ियेां की औसत उम्र 30 के आस पास है। आस्ट्रेलिया इसमें एक अपवाद हो सकता है और यही कारण है कि एकदिवसीय क्रिकेट का यह चैम्पियन इस नये क्रिकेट में सफलता से दूर है। दरअसल यह क्र्रिकेट केवल ताकत का क्रिकेट नहीं है बल्कि इसमें नई सोच की भी जरूरत है। यहां तुरंत निर्णय लेना और अगले ही पल उसे क्रियान्वित करना जरूरी होता है। इसी जवां सोच की परीक्षा 5 जून से ईग्लैण्ड में होगी और इस परीक्षा में सबसे ज्यादा उम्मीद हम भारतीयो को है । इसका कारण धोनी की सबसे जवां टीम ही नहीं है बल्कि एक कारण और है। यह कारण है कि इस नये जमाने की क्रिकेट की हम अगुवाई कर रहे है।
मनीष कुमार जोशी, सीताराम गेट के सामने, बीकानेर





राजनैतिक का  ओलम्पिक
 
 ओलम्पिक आंदोलन के चार्टर में स्पष्ट रूप  से अंकित किया गया है कि इन खेलो के आयोजनो का उद्धे’य खेलो के माध्यम से वि’व में एकजुटता, ’िाक्षा, शांति और सद्भावना का प्रचार प्रसार करना है। 1896 में शुरू हुए इस ओलम्पिक आंदोलन में मात्र 14 दे’ाो ने भाग लिया था। परन्तु ज्यों ज्यों आंदोलन आगे बढ़ा दुनियाभर के दे’ा इस आंदोलन से जुड़ते गये और यह संख्या 14 से बढ़कर 200 तक पहंुच गई। इससे लगा कि यह आंदोलन अपने उद्धे’य में कहीं न  कहीं सफल हो रहा है  लेकिन इसका दूसरा पहलू है कि इस आंदोलन से जुड़े प्रतिभागीयों अपने उद्धे’य के इसका दुरूपयांेग करना शुरू कर दिया।  इस कारण यह आंदोलन लगातार कमजोर हो रहा है। बीजींग में हो रहा यह आयेाजन मेजबानी के आवंटन के समय से ही विवादो में रहा है।  मानवधिकारो को लेकर बीजींग की मेजबानी का विरोध होता आया है। ओलम्पिक म’ााल के समय यह विरोध पराकाष्ठा पर पहुंच गया और विभिन्न दे’ाो में तिब्बत मामले को लेकर कटुता बनी।  इससे ओलम्पिक आंदोलन की रफ्तार कमजोर पड़ती दिखाई दी। यह खेलो के माध्यम से अपनी राजनैतिक स्वार्थ की पूर्ति का साधन बनता नजर आ रहा है।  यह एक खेलो का मंच कम और राजनैतिक मंच ज्यादा नजर आ रहा है। खेल दूसरे पायदान पर आ गया है। ओलम्पिक कही न कहीं राजनैतिक शक्ति प्रदर्’ान का अखाड़ा बनता नजर आ रहा है ं। ऐसे में शांति सद्भाव और ’िाक्षा का प्रसार जैसे बाते बेमानी लगती है।
ओलिम्पक में भाग लेने वाले दे’ाो की संख्या जब से बढ़ी है तभी से यह राजनैतिक शक्ति प्रदर्’ान का माध्यम बन गया है।  जर्मनी के नाजीवादियों ने 1936 के बर्लिन ओलम्पिक को अपनी विचाराधारा के प्रचार का माध्यम बनाया। इस कारण कई दे’ाो ने ओलम्पिक आंदोलन का बहिष्कार किया। रूस ने तो 1952 के ओलमिपक तक इस आंदोलन से दूर रहा । इसी प्रकार 1968 का ओलम्पिक रंगभेद के लिए चर्चित रहा। 19689के मैक्सिको सिटी ओलम्पिक  में दो अ’वेत अमेरीकी एथलीटो ने 200 मीटर  की दौड़ जीतने के बाद अ’वेत के ताकतवर होने का अहसास ट्र्रेक पर प्रदर्’िात किया । अ’वेतो द्वारा अ’वेत जाति को ताकतवर बताना गोरे लोगो को पसंद नहीं आया और अच्छा खासा विवाद खड़ा हो गया। अमेरीका ने विवाद के बाद एथलेटिक्स की पूरी टीम को वापिस बुला लिया। रंगभेद को लेकर हुआ यह विवाद ओलम्पिक के लिए एक दाग की तरह है और उसके उद्धे’यो की प्राप्ति के मार्ग में बाधा साबित हुआ है। इसी तरह 1956 के मेलबोर्न ओलम्पिक का इस्तेमाल स्वेज नहर के विवाद में दबाव बनाने के लिए किया गया। सोवियत रूस, कंबोडिया , हंगरी और मि़श्र आदि ने स्वेज नहर विवाद में विरोधी पक्षो के दे’ाो पर दबाव बनाने के लिए मेलबोर्न ओलम्पिक का बहिष्कार किया। चीन आज निर्विववाद रूप से ओलम्पिक आयोजन का दावा कर रहा है लेकिन 1976 में चीन (ताईपे) की टीम को भाग लेने से रोकने के लिए चीन गणराज्य ने ओलम्पिक आयोजन समिति पर जबरदस्त दबाव बनाया और विवाद खड़ा किया। वही चीन आज तिब्बत विवाद के बावजूद निर्विवाद ओलम्पिक आयोजन का दावा कर रहा है। ऐसे में ओलम्पिक चार्टर के उद्धे’य कहीं पीछे छुट जाते है। अफगानिस्तान में सोवियत संघ की सैनिक कार्यवाही के विरोध में 1980 के मास्को ओलम्पिक में लगभग 65 दे’ाो ने बहिष्कार किया। इसका कारण खेल नहीं होकर राजनैतिक था । ऐसे मे ओलम्पिक आंदोलन अपने उद्धे’य से साफ तौर पर भटकता नजर आता है और खिलाड़ी असहाय नजर आते है।
ओलम्पिक आंदोलन के माध्यम से शांति और भाईचारे की बात की जाती है। ओलम्पिक चार्टर में भी ओलम्पिक का उद्धे’यो के माध्यम से वि’व में शांति और सद्भावना का संदे’ा देने की बात कही गई हैं। लेकिन इसी ओलम्पिक आंदोलन को आंतकवादी घटनाओ ने आहत किया है। 1972 के म्यूनिख ओलम्पिक में एक आतंकी ग्रुप द्वारा इ्रजरायल टीम के ग्यारह सदस्यो को मार दिया गया। इसी तरह 1996 में अटलांटा ओलम्पिक के दौरान अंटलांटा के ओलम्पिक स्टेडियम में हुए एक बम विस्फोट ने पूरे खेल जगत को भयभीत कर दिया। इस हमलें में दो व्यक्तियों की मौत हो गई 111 व्यक्ति घायल हो गये। इस तरह आतंकी घटनाओ ने ओलम्पिक आंदोलन को कमजोर करने का प्रयास किया है। राजनैतिक समस्याओ के चलते प्रथम वि’वयुद्ध और द्वितीय वि’व युद्ध के दौरान ये खेल आयोजित नहीं हुए। मतलब साफ है दुनिया के लिए खेलो से ज्यादा महत्वपूर्ण राजनैतिक स्वार्थ है। राजनैतिक स्वार्थो के चलते एक बार नहीं अनेकोबार खेलो की बलि दी गई है। ओलम्पिक आंदोलन भी इससे अछुता नहीं है।
 कुल मिलाकर ओलम्पिक जिस तेजी से मजबूत हुआ उसी तेजी से कमजोर भी हुआ । अब ओलम्पिक एक राजनैतिक शक्ति प्रदर्’ान का माध्यम बन गया है। खेल कहीं पीछे रह गया है। खेलो में जीत हासिल कर गौरान्वित होना अब चलन में नहीं बल्कि खेलो के माध्यम से अपना राजनैतिक प्रभुत्व दर्’ााया जाना चलन में है।  ’िाक्षा, खेलो को बढ़ावा, शांति और सद्भावना के उद्धे’य गौण होते जा रहे है। ओलम्पिक के पदक विजेता खिलाड़ी अपने अपने दे’ाो में अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रहे जबकि राजनैतिक शक्तियां इस आंदोलन का भरपूर लाभ उठा रही हे। ऐसे में यह आंदोलन कम से कम आपने उद्धे’यो को लेकर तो कमजोर पड़ता नजर आ रहा है।


विम्बलडल 2008 ने इतिहास दोहराया
 स्पेन के राफेल नडाल ने विंबलडन किंग रोजर फेडरर का साम्राज्य खत्म करते हुए रविवार को नए विंबलडन चैंपियन बने।
 
विश्व के दूसरे नंबर के खिलाडी नडाल ने गत पाँच बार के चैंपियन फेडरर को लगभग पाँच घंटों तक चले मैराथन संघर्ष में 6-4, 6-4, 6-7, 6-7, 9-7 से हराकर अपना पाँचवाँ ग्रैंड स्लेम खिताब जीत लिया।
 
फेडरर का इस हार के साथ स्वीडन के महान ब्योन बोर्ग का लगातार पांच बार विंबलडन खिताब जीतने का रिकॉर्ड तोड़ने का सपना टूट गया।
 
विश्व के चोटी के दो खिलाड़ियों के बीच फाइनल में खेल हर लिहाज से चरम स्तर पर था। नडाल ने जहाँ पहले दो सेट 6-4, 6-4 से जीतकर खिताब की तरफ कदम बढ़ा दिया था वहीं विश्व के नंबर एक खिलाड़ी फेडरर ने गजब की वापसी करते हुए अगले दोनों सेट टाइब्रेक में जीतकर मैच को निर्णायक सेट में पहुँचा दिया।
 
फाइनल मुकाबला वर्षा के कारण विलंब से शुरू हुआ और इसे वर्षा के बार दो बार बीच में रोकना पड़ा। निर्णायक सेट में जब दोनों खिलाड़ी 2-2 ओर 40-40 की बराबरी पर थे तो वर्षा के कारण फिर खेल रोकना पड़ा।
 
मैच शुरू होने पर दोनों खिलाड़ी स्कोर को 7-7 तक ले गए। 15वें गेम में नडाल ने फेडरर की सर्विस तोड़कर 8-7 की बढ़त हासिल कर ली और उसके बाद अपनी सर्विस बचाते हुए फेडरर के विंबलडन में पाँच वर्ष के साम्राज्य को खत्म करते हुए नए चैंपियन बन गए।
एक बार फिर दुनिया भर के एथलीट बीजींग में अपने दे’ा की प्रतिष्ठा के लिए खेल के मैदान में संघर्ष कर रहे है और उनके संघर्ष से टपके पसीने से ख्ैालो का रोमांकच पूरी दुनिया की हवा मै तैर रहा है। एक दूसरे को खेल के मैदान में पटकनी देने की को’िा’ा करते हुए खिलाड़ी खेलो के माध्यम से सद्भावना और शांति का संदे’ा रहे रहे है। ओलम्पिक का आयोजन इसका माध्यम है। ओलम्पिक के चार्टर में स्पष्ट रूप से खेलो के माध्यम से शांति, सद्भावना और ’िाक्षा के प्रसार का संदे’ा प्रचारित करने की बात कही है। आधुनिक ओलम्पिक आंदोलन को शुरू हुए सौ साल से भी ज्यादा का समय हो गया है लेकिन आज भी ओलम्पिक आंदोलन पूरी तरह से अपने उद्धे’यो में सफल  नहीं हो पाया है ? जिस प्रकार से ओलिम्पिक आंदोलन आगे बढ़ा था उससे ‘कहीं न कही यह वि’व को एकजुट रखने के अपने उद्धे’य में काम्याब होता दिखाई दिया  परन्तु कुछ एक घटनाओ ने इस आंदोलन को भटकाव के रास्ते पर ला दिया है।  हर चार वर्ष बाद आयोजित होने वोल इस ओलम्पिक खेल आयोजनो के सफल आयोजनो में लगातार कई वर्षो से आ रही बाधाओ से यह आंदोलन को कमजोर हुआ है। ओलम्पिक चार्टर में उल्लेखित अपने उद्धे’यो को प्राप्त करने मे यह आंदोलन कहीं न कहीं पीछे छुटता नजर आया है&#



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